बाड़ीलाइन राजनीति ! (निक्की कहानी)

बाड़ीलाइन राजनीति ! (निक्की कहानी)
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अरे यार ! कल तो सारा मूड ही खराब हो गया ! भारत मैच हार गया ! मैं तो पटाखे भी लेकर आया था ! (विक्रम ने कहा)

एक बात बताओ ! तुम्हें क्रिकेट से प्यार है या हार-जीत से ? (संजीव ने पूछा)

विक्रम : ये भी कोई पूछने की बात है ? मुझे क्रिकेट से ही प्यार है ! 

संजीव : झूठ बोलते हो ! अगर क्रिकेट से प्यार होता तो तुमने कल का मैच एन्जॉय किया होता ! देश से प्यार होना अच्छी बात है पर खेल खेलते समय देश नहीं बल्कि खेल की भावना मन में होनी चाहिए ! क्रिकेट के इतिहास में बाड़ीलाइन का दौर शर्मनाक दौर माना जाता है, शायद इसी प्रकार आज की राजनीति भी भविष्य में बाड़ीलाइन राजनीति मानी जायेगी, जिसमें घटिया स्तर पर राष्ट्रवाद को परिभाषित किया जा रहा है !

विक्रम (दुखी होते हुए) : अरे सीधी बात कर ना ! 

संजीव : टीम अपनी हो या दुसरे देश की ! हमें खेल-भावना को प्रमुखता देनी चाहिए ! चाहे कोई भी टीम जीते पर हमें खेल की तकनीक, चौके-छक्के आदि को प्रशंसा की नज़रों से देखना चाहिए, ना की सिर्फ अपनी टीम की हार-जीत पर ही भावनाएं व्यक्त करने के ! खेल को खेल रहने दो, उसे अपनी सड़ी हुई मानसिकता का दर्पण ना बनने दो ! 

विक्रम : अरे, राष्ट्रीयता नाम की कोई चीज़ है भी तुममें ? तुम तो देशद्रोही लग रहे हो !

संजीव : राष्ट्र के प्रति सम्मान होना एक बात है और खेल के प्रति समर्पण एक बात ! खेल और राजनीति को मिलाओ मत ! अगर राष्ट्रवादी होना किसी एक ख़ास राजनितिक पार्टी के विचारों का नाम है तो माफ़ करना मैं राष्ट्रवादी नहीं बनना चाहता ! देश सभी राजनितिक दलों की निजी विचारधाराओं से ऊपर है ! खेल सभी दुर्भावनाओं से ऊपर है ! हमें अपनी छोटी सोच के कारण देश को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने का कोई हक़ नहीं है ! खेल हो या राजनीति, खेल भावना से ही होना चाहिए ! 

विक्रम : ठीक कहते हो भाई ! मैं अपनी आडम्बरवादी राष्ट्रवादी सोच को ही सही समझता था ! अब मैं महसूस कर रहा हूँ की मैं कितना गलत था ! वाकई... खेल हो या राजनीति .... शुद्ध भावना से ही होनी चाहिए ! वर्ना अँधा बांटे रेवड़ी, फिर फिर अपनों को दे" वाली बात हो जायेगी ! 

चीज़ों को उनके वास्तविक स्वरूप में स्वीकार करने से जीवन में "सहिष्णुता" आती है और पदार्थवादी लालची सोच से "असहिष्णुता" ! खेल-भावना से मन निर्मल हो जाता है और निर्मल मन एक नेक और सच्चे राष्ट्रवादी की पहचान है ! (कहते कहते संजीव की आँखें भर आयीं) {पीछे टी.वी. पर एक असहिष्णु रिपोर्टर चीख चीख कर अंध-राष्ट्रवाद को परिभाषित कर रहा था}

- बलविंदर सिंघ बाईसन