मूत्र हिंसा ! (निक्की कहानी)

मूत्र हिंसा ! (निक्की कहानी)
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अरे नहीं यार ! तू फिर खड़ा हो गया खुले में पेशाब करने ? (हरीश ने अपने मित्र कमलेश को टोका)

कमलेश : फिर कहाँ करूँ ? इतनी बड़ी मार्किट है पर जन-सुविधाओं का अकाल है यहाँ ! ले देकर एक मूत्रालय है सरकारी, और वो भी बदबू और गन्दगी से भरा रहता है !

हरीश : वो सामने धर्म-स्थान है वहां चला जा !

कमलेश : उनकी तो बात मत करो, वहां वो लोग हमेशा ताला लगा कर रखते हैं, तांकि मार्किट के लोग इस्तेमाल ना कर सकें !

हरीश : क्यों, यह सेवा का और भलाई का कार्य नहीं है ? या सिर्फ भगवान् के नाम पर लूट मचाने को ही प्रभु की सेवा कहा जाता है !

कमलेश (हँसते हुए) : मेरे विचार में जिस प्रकार सभी पेट्रोल पम्पों में मूत्रालय की सुविधा देना आवश्यक है उसी प्रकार सभी धर्म-स्थानों, स्कूलों-कालेजों, सरकारी इमारतों इत्यादि की दीवारों में बाहर की तरफ कम से कम एक जन-सुविधा (स्त्री और पुरुष दोनों के लिए) होनी चाहिए ! इससे देश में बड़े पैमाने पर हो रही "मूत्र-हिंसा" पर रोक लगेगी !

हरीश (समझते हुए) : अब क्योंकि यह मूत्रालय इनकी संपत्ति में होंगें तो यह लोग इसकी साफ़ सफाई की तरफ भी ध्यान रखेंगे वर्ना अधिकतर सरकारी मूत्रालय तो "बीमारियों की सौगात बांटते हैं" ! लाखों धर्म-स्थानों पर करोड़ों अरबों का दान करने वाले अगर इस तरफ भी ध्यान दे तो समाज और सामाजिक परिस्तिथियों में बदलाव आ सकता है ! अब इन राजनितिक लोगों के भरोसे पर देश को नहीं छोड़ा जा सकता, इन्हें दिखाना होगा की काम ऐसे होते हैं ! वहां पर दान-पात्र लगाए जा सकते हैं तांकि इस जनसेवा में ज्यादा से ज्यादा लोग जुड़ सकें और इन्हें सुचारू रूप से चलाया जा सके !

कमलेश : जब इतनी बड़ी गिनती में जन-सुविधाएँ होंगी तो कौन करेगा "मूत्र हिंसा" और "पोटी प्रदूषण ?" जरूरत केवल सोच बदलने की है !

हरीश (मज़ाक में) : "शौच" को बदलो, "शौचालय" बदल जायेंगे !

- बलविंदर सिंघ बाईसन