सोच को बदलो, शौचालय बदल जायेंगे ! (निक्की कहानी)

सोच को बदलो, शौचालय बदल जायेंगे ! (निक्की कहानी)
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अरे ये कौन लोग हैं, जो पब्लिक शौचालय की सफाई में जुटे हैं ? शक्ल और कपड़ों से तो भले घरों के लगते हैं ! आ देखे जरा ! (मनोज ने सड़क से गुजरते हुए विजय का ध्यानाकर्षण किया)

अरे सरदार जी ! ये आप लोगो के काम नहीं है ! सरकार का काम सरकार को करने दो ! आप कहाँ गन्दगी में मुंह मार रहे हो ? गुरुद्वारों में शौचालय साफ़ करते करते ये आप को क्या सूझी ? (मनोज ने हरमीत सिंघ को संबोधित करते हुए कहा)

हरमीत सिंघ : हमनें फैसला किया है कि धर्मस्थान में सेवा तो जैसे कर रहे हैं वैसे ही करते रहेंगे पर हफ्ते में कम से कम एक दिन अपने आस पास के इलाकों के सार्वजनिक शौचालय भी हम साफ़ करेंगे ! सरकार ने साफ़ रखने होते या सरकारी कर्मचारियों ने साफ़ रखने होते तो कब के साफ़ हो जाते ! अब आम जनता को ही आगे आना होगा और सरकार के मुंह पर तमाचे की भाँती इस सेवा को निभाना होगा !

मनोज : पर इतनी गन्दगी होती हैं इन सार्वजनिक शौचालयों में कि एक किलोमीटर दूर से ही बदबू आने लगती है ! हमारे देश की जनता भी तो नहीं चाहती की यह साफ़ हों !

हरमीत सिंघ : पब्लिक को छोडो, क्या आप हमारे साथ हो ? हमें अपने कर्मों से मतलब है, पब्लिक खड्डे में गिरेगी तो क्या हम भी गिरेंगे ? अगर इतना पढ़ लिख कर भी हमने उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया तो क्या फ़ायदा ऐसी पढाई का ? इस पब्लिक को साफ़ रहने की आदत डालना मुश्किल तो है पर नामुमकिन नहीं !

मनोज : क्यों शर्मिंदा करते हो ! धर्म-स्थानों पर तो हम ऐसी सेवा करने को महा-पूण्य समझते हैं, अब अगर समाज की सेवा भी धर्म की सेवा समझ कर कर लेंगे तो भगवान् रुपी जनता को सुख की प्राप्ति होगी ! जनता सुखी होगी तो बीमारियाँ कम फैलेंगी ! बीमारियाँ कम फैलेंगी तो देश के नागरिक स्वस्थ होंगे और स्वस्थ जनता देश को तरक्की की और ले जायेगी ! जहाँ तन स्वच्छ, वहां मन स्वच्छ !

लाइए दीजिये एक सैट ग्लव्स ! (विजय ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा)

हिन्दू - मुस्लिम - सिख्ख - इसाई ! 
अब तो करेंगे, मिल कर सफाई !

हरमीत सिंघ ने गाने की तर्ज पर कहा तो बसबस वहां मौजूद लोगों के चेहरों पर मुस्कान आ गयी !

- बलविंदर सिंघ बाईसन