आम आदमी ! (निक्की कहानी)
हिप हिप हुर्रे ... आम आदमी पार्टी जीत गयी ! अब तो दिल्ली और उसके बाद पूरे भारत के दिन फिर जायेंगे ... अरे भाई ... राम राज आ जाएगा अब तो ! (ख़ुशी से पागल हुआ रमेश झूम रहा था)
किशोर : क्यों खुश हो रहा है मेरे "मानसिक बीमार भाई" ?
रमेश : अरे तुझे पता नहीं की दिल्ली में झाड़ू चल गयी है और एक ईमानदार सरकार ने शपथ ले ली है ? किस दुनियां में रहता है भाई ? अब तो जनता को उसका हक़ मिल कर रहेगा ! (नाचने लगता है)
किशोर (थोडा सोचते हुए) : भारतीय जनता को देख कर वो फ़िल्में याद आ जाती है जिनमें जमींदार द्वारा सताए गए गरीब किसान हीरो द्वारा जमीदार के गुंडों की पिटाई के बाद खुशियाँ मनाना शुरू कर देते हैं और जैसे ही जमींदार उनके एक-आध साथी को मार देता है तो सभी मिल कर हीरो को बुरा-भला कहते है की तुम्हारे कारण हमारा साथी मारा गया, हम तो पहले ही ठीक थे जब जमींदार को उसका नाजायज़ हिस्सा भेज कर सुखी रहते थे !
इस जनता को समझना बहुत मुश्किल है .. ये अपने को बचाने आये हीरो की भी पिटाई कर सकती है ! जरूरत इस जनता को अन्याय के खिलाफ शिक्षित करने की है तांकि हर आम आदमी अपने आप में खुद ही हीरो बन जाए और इस अन्याय के खिलाफ खड़ा हो जाये !
वर्ना श्री केजरीवाल जैसे ईमानदार कितने आये और कितने चले गए, पर जनता घनघोर जाहिल ही रही .. दो पैसे का मुनाफा दिखा तो "जय जय" और जहाँ जमींदारों द्वारा कोई चाल चल कर हीरो के खिलाफ एक झूठा जाल बुना गया तो वही भोली जनता "मुर्दाबाद-मुर्दाबाद" के नारे लगाने तक पहुँच जाती है !
देश को बदलने के लिए "सत्ता" बदलने से थोडा फर्क पड़ सकता है पर असली फर्क तब महसूस होगा जब आम आदमी (जनता) भी इस बदलाव की हवा के साथ अपनी मानसिकता बदलेगा !
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