वो सुबह कभी तो आएगी !
अंधे की आंखोदेखी कहानी पर कभी यकीन मत करो। इस देश को एक "अन्ना (अंधे)" को संजय बता कर भ्रष्टाचार की आंखोदेखी कहानी सुनाई गई और पूरे देश में महाभारत करवाई गई । जाने वाले शहीद हो कर चले गए और आने वालों ने कभी ना जाने की मातृभूमि शपथ ली।
"अन्ना" (अंधा) होना कितना कारगार है, यह देख कर सभी स्तंभों ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली। इस से सब तरफ घोर अंधेरा हो गया और इस अंधेर नगरी के राजा ने सब कुछ चौपट करना शुरू किया !
गधों ने सामाजिक तौर पर "हिनहिनाते हुए (असल में रेंकते हुए)" अपनी शान में खुद ही कसीदे पढ़ने शुरू किए, ठीक उस अंधे की कहानी की तरह। एक अंधे की शादी बड़ी मुश्किल से एक कुरूप और कर्कश स्त्री के साथ हो गई। अब उस स्त्री ने सोचा कि इसे कौन सा दिखाई देता है, उसने प्रथम मिलन की रात को शर्माते हुए, संकुचाते हुए अंधे से कहा कि "अगर आप देख सकते तो देखते कि मैं कितनी सुकुमारी और सुंदरता की मूर्ति हूं"! अंधा धीरे से हंसा और बोला, "अगर तू इतनी ही खूबसूरत होती, जैसा कि बता रही है तो ये आंखों वाले तुझे मुझ तक आने ही ना देते"!
खैर, आंखोदेखी कहानियां तो सुनाई जाती रहेंगी। कहानियों के पात्र बदलते रहेंगे। कालांतर से ऐसा होता आया है। इंग्लिश की कहावत है कि "एवरी डॉग हैस हिज डे" भावार्थ "हर कुत्ते के दिन बदलते हैं"!
रात जरूर जाएगी, वो सुबहा कभी तो आएगी !
गाना सुनिए (आंखों देखा नहीं, कानों सुनना) :
वो सुबह कभी तो आएगी
इन काली सदियों के सर से जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर झलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा जब धरती नगमे गाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
जिस सुबह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर के जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं
इन भूखी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इन्सानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे सिक्कों में न तोली जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को ना बेचा जाएगा
चाहत को ना कुचला जाएगा, इज्जत को न बेचा जाएगा
अपनी काली करतूतों पर जब ये दुनिया शर्माएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूख के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
मजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फांकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीख न मांगेगा
हक़ मांगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
फ़आक़ों की चिताओ पर जिस दिन इन्सां न जलाए जाएंगे
सीने के दहकते दोज़ख में अरमां न जलाए जाएंगे
ये नरक से भी गंदी दुनिया, जब स्वर्ग बनाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
जिस सुबह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर के जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं
वो सुबह न आए आज मगर, वो सुबह कभी तो आएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
- बलविंदर सिंघ बाईसन
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