मुखाग्नि ! (निक्की कहानी)
यार आप लोग भी ना ! अरे मरना है तो खुद मरो, औरों को क्यों मार रहे हो ? (अपनी अगली सीट पर बैठे आदमी को सिगरेट पीते देख कर मनोहर ने कहा)
ज्यादा तकलीफ है तो कहीं और जा कर बैठ जाओ ! (उस आदमी ने गुस्से से कहा)
रहने दे यार ! क्यों इसके मुंह लग रहा है ! क्या इसे नहीं पता कि सिगरेट पीने से कैंसर हो सकता है ? इसे सब पता है पर यह लोग तो उस आदमी की भांति है जो सिगरेट की नयी पैकिंग जिस पर लिखा था कि "सिगरेट पीने से दस्त लग सकते हैं" को वापिस करते हुए पनवाड़ी से बोला कि भाई वही वाला पैकेट दो जिस पर लिखा होता है कि "सिगरेट पीने से कैंसर होता है" !
ज्यादा मज़ाक सूझ रहा है ? बताऊँ ? (आदमी गुस्से में था)
किशोर : रहने दे भाई ! तू तो वैसे भी महान है कि जीते जी खुद को मुखाग्नि दे रहा है ! तेरे को बुढापे में तकलीफ भी नहीं होगी क्योंकि शायद तू जवानी में ही मर जाए ! पहले लोग मरने के बाद "मुखाग्नि" देते थे....आज कल जीते-जी ही खुद को, अपने मूँह को "मुखाग्नि" दे रहे हैं !! सिगरेट स्मोकिंग मुखाग्नि की चाबी है !! (गाते हुए) "जीते जी खुद को मारना... यह कोई बात है ?" (आमिर खान के गाने की नकल करते हुए)
चल छोड़ यार, मरने दे ! यह नहीं समझेगा ! हम ही एक तरफ हो जाते है ! (मनोहर ने बात बढ़ती देखते हुए कहा)