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Balvinder Singh Bison

बकरी की लेंडी ! (निक्की कहानी)

जब तक सोशल एक्टिविस्ट, धार्मिक एवं राजनितिक नेता रुपी "मैं मैं के अभिमान में डूबी बकरियां" बनती रहेंगी तब तक समाज या धर्म, किसी का भी भला नहीं होगा ! (किशोर ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा)
 
बकरी दूध तो देती है (अच्छे कार्य करती है) पर भगोना मेंगनों से भी भर देती है ! बकरियों का काम है, कि वो तो बस "मैं-मैं-मैं" करती रहेंगी और सालों बीत जाने के बाद भी वहीँ अपने चिर-परिचित रेवड़ (समूह) में घास चरती नज़र आएँगी ! और बकरियों अहंकार की घास खाती रहेंगी और करती रहेंगी उसी अहंकार की छोटी छोटी मेंगने (लेंडी) ! (विनोद ने उसकी बात को आगे बढाया)
 
खैर इन बकरियों की सूखी मेंगनों (लेंडी) से छोटे बच्चे (नए नए एक्टिविस्ट, नए नए नेता) मज़े से खेलते हैं और अग्रसर होते हैं एक नयी बकरी बन जाने की ओर !
 
लड़ाई लड़ाई माफ़ करो, बकरी की लेंडी साफ़ करो ! (पास ही खेल रहे बच्चो की आवाज़ ने उन दोनों को पहले चौंकाया फिर दोनों जोर जोर से हँसने लगे !
 
- बलविंदर सिंघ बाईसन

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