प्याज और धर्म परिवर्तन ! (निक्की कहानी)
और राधेश्याम क्या हाल है भाई ? प्याज की कीमतें तो आकाश छू रही हैं आजकल ! (निर्मल ने कहा)
राधेश्याम : मैं तो भाई दो महीने के लिए "जैन धर्म" का अनुयायी बन रहा हूँ !
निर्मल (हैरानी से) : क्यों ?
राधेश्याम : प्याज इतना महंगा हो गया है की मेरी ताकत से बाहर चला गया है. दो महीने में इसी बहाने जैन धर्म की जानकारी भी हो जायेगी और पैसा भी बच जाएगा ! धंधा करने के लिए नए लोग भी मिल जायेंगे ! (हँसता है)
निर्मल : तुम्हारी इस बात ने मेरे कपाट खोल दिए, हास्य में कही गयी बात कभी कभी सत्य को प्रगट कर देती है. समाज में बहुत से लोग महिंगाई, लालच (जर, जोरू, जमीन) या डर आदि के बस में आ कर धर्म परिवर्तन की राह पकड़ते हैं और समय के खेल में इधर से उधर गुलाटियां मारते रहते हैं. "ना इधर के रहे ना उधर के रहे". कालांतर में उनकी हालत धोबी के कुत्ते जैसी पायी जाती है.
राधेश्याम (हाँ में हाँ मिलाता है) : सही कहते हो भाई, मैंने बात की तो मजाक में ही थी, पर तुम्हारी बात बिलकुल सत्य है की दो किश्तियों की सवारी करने वाला हमेशा डूबता है ! धर्म अपनी इच्छा से चुनना चाहिए ना की किसी भी दबाव, डर या लालच में आ के. जहाँ भी रहो उसके नियमो का पालन करो !
निर्मल (मुस्कुराता हुआ) : बात कहाँ से शुरू हुई और कहाँ पर ख़तम हुई ! (दोनों हँसते हैं)
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