अभिमान का कहकहा (लघु कथा)
देख तो इसकी सूंड कैसे भागती फिर रही है ! बशीर अहमद ने फेसबुक के एक ग्रुप में एक दुसरे धर्म के "देवता" की फोटो डाली और फिर लगे सब अलग अलग तरीके से उसका मज़ाक बनाने ! हाजी अब्दुल मलिक ने जब यह देखा तो उस से रहा न गया , और उसने पूछ ही लिया, “बरखुरदार बशीर अहमद मीआं, यह क्या बेहूदा हरकत कर रहे हो तुम ?”
बशीर अहमद गुस्से से तमतमा के बोला " आप तो मेरे पीछे पड़ गए हैं, उनको कुछ क्यों नहीं कहते ?. वोह भी तो हमारे परवरदिगार अल्लाह हुजूर, मोहम्मद साहेब और हमारा मज़ाक उड़ाते हैं ? तब आप कहाँ रहते हैं ?, क्या वोह आपके ज्यादा ख़ास हैं ? मोहम्मद साहेब ने भी तो इन लोगो को बुरा बताया है ".
हाजी अब्दुल मलिक : हैं ? यह विचार भी तुम्हारे मन में कैसे आ गया की मोहम्मद साहेब ने , मूर्ति पूजको, या दूसरे धर्म को मानने वाले को बुरा भला कहा है? मोहम्मद साहेब तो कभी भी किसी और धर्म को मानने वाले, भ्रम करने वाले, अपनी मर्जी करने वाले, कर्मकांडों में विश्वास करने वालो पर नहीं हसें, किसी को गुस्से की लात नहीं मारी, बल्कि एक सच्चा मुसलमान और एक अच्छा इंसान बनने और एक अल्लाह हुज़ूर की बंदगी करने को कहते थे !
नई जमात को सिखाने का ज़िम्मा पुरानी जमात पे होता है , लेकिन अपने निजी पुरानी सोच को धर्म प्रचार के नाम पर "अंधी और कठोर धार्मिकता (कट्टरवाद)" को बढ़ावा दे कर लोगो में नफरत पैदा करना, यह किसी भी "धर्म" की निशानी नहीं है और न ही यह किसी का होना चाहिए. अगर ऐसा होता है तो, क्या फर्क रह जाता है हम में और , उन धर्म के बिचोलियों, तथाकथित परिशद, लीग, दल, राजनितिक दलों के जो के अपने फायदे के लिए धर्म का सहारा ले कर हमारे बारे में कुप्रचार करते हैं और लोगो में फूट डालते हैं ? और वैसे भी क्या फायदा होता है ऐसे करने से , वह एक बोलेंगे, तुम दो ...फिर यह सिलसिला तो चलता ही रहेगा ! वो भी अंधे अज्ञानी और हम भी अंधे अज्ञानी !
याद रखना , अगर आज मोहम्मद साहब मौजूद होते तो हमे सख्त ताड़ना करते की क्या बना के रख दिया इस्लाम को, इतना बिगाड़ आ गया है, जैसे की अपने धर्म के अलावा किसी और धर्म को मान्यता नहीं देना, उनसे नफरत करना, उनको अपने से नीचा समझना !
धर्म कभी भी नफरत नहीं सिखाता, यह तो धर्म को मानने वाले की अपनी समझ होती है जो कई बारी धर्म ग्रंथो जैसे कुरान शरीफ, बाईबल, भगवत गीता, श्री गुरु ग्रन्थ साहेब के उपदेशो का अज्ञानी लोगों द्वारा "गलत प्रस्तुतीकरण एवं गलत व्याख्या" के कारण ही घृणात्मक विचार एवं भ्रम पैदा होते हैं ! और अगर लोग अपनी अंधी श्रद्धा को छोड़ कर , एक बार सच खोजने की कोशिश करे तो समाज की आधी से ज्यादा मुश्किलों का अंत तो तुरंत ही हो जाए !
हाजी अब्दुल मलिक ने एक बार रुक कर बशीर अहमद की और देखा और आगे बोला : खुदा के बन्दे का किरदार पानी से लबालब भरे बर्तन में तैरते हुए चमेली के फूल की तरह होना चाहिए, न की पत्थर की तरह, जो की आप भी डूबे और बर्तन का पानी भी बाहर छलका दे !
चलता हूँ, अज़ान का वक़्त हो रहा है, बरखुरदार, तुम भी अपनी नमाज़ में खुदा से यह दुआ माँगना के तुम्हे वह यह सौगात बक्शे की तुम इस्लाम की अच्छी बाते लोगो को बता सको और दूसरो से अच्छी बातें सीख सको !
आखिरी बात : जैसा व्यवहार अपेक्षित हो...उसी तरह का व्यवहार दर्शाना चाहिए...
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