ए मेरे वतन के लोगों ! (निक्की कहानी)
आज के दिन हमारा देश आज़ाद हुआ था और इस कारण हर साल बहुत ही भव्य समारोह किये जाते हैं ! (अमरीका से आये हुए अपने मित्र पीटर को दिल्ली घुमाते हुए राजेश बता रहा था)
पीटर (इंग्लिश में) : मैंने तुम्हारा देश का इतिहास पढ़ा हुआ है ! तुम्हे ख़ुशी तो जरूर मनानी चाहिए, पर गम को कैसे भूल सकते हो ? एक मनुष्य की जान भी कितनी कीमती है यह तुम्हें हमारे समाज से सीखने की जरूरत है !
राजेश (हैरानी से) : कैसा गम ? देश की आजादी तो ख़ुशी की बात है और इस दिन तो सरकारी छुट्टी भी होती है तांकि सब प्रेम और भाईचारे से अपनी आजादी को मना सकें !
पीटर (समझाते हुए) : आज़ादी का जश्न मनाना बहुत ही शानदार बात है, और मनाया जाना भी चाहिए क्योंकि आज़ादी से जीना इंसान का मौलिक अधिकार है ! पर क्या उन लाखों लोगों की अकाल मृत्यु के लिए 2 मिनट का मौन भी रखना जरूरी नहीं है जो देश के बंटवारे से पहले जिन्दा नागरिक थे और कुछ नेताओं की अदूरदर्शिता और अड़ियल रवैये के कारण मारे गए !
राजेश का मुंह खुला का खुला रह जाता है और वह शर्म से अपना सर झुका लेता है ! इंसानी जान की कीमत उस विदेशी ने आज उसे समझा दी थी ! राजेश के दिमाग में एक फिल्म का डायलोग घूमने लगा "एक चुटकी सिन्दूर की कीमत तुम क्या जानो राजेश बाबू ?"
राजेश की आँखों के सामने फिल्मों में देखे हुए देश के बंटवारे के दृश्य घूमने लगे जहाँ वहिशी दरिन्दे धर्म के नाम पर एक दुसरे को काट रहे थे और हज़ारों महिलाओं के साथ जोर-जबरदस्ती हो रही थी ! अचानक उसे आज़ादी की कीमत का अहसास होने लगा ! (उसकी हालत देख कर पीटर भी घबरा गया)
पीछे कहीं गाना बज रहा था ... "ए मेरे वतन के लोगो, जरा आँख में भर लो पानी ......."
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