बुलडोजर ! (निक्की कविता)
बुलडोजर चले हरी घास पर, नारंगी तालियां मारे !
अब आया नारंगी का नंबर, तब क्यों चीखें मारे ?
बैसंतर देव पुकारें, जब लगे पड़ोसी के द्वारे !
बचाओ बचाओ चिल्लाएं, जब आग पहुंचे अपने द्वारे !
तू ना समझ मतवाली आग को किसी का भी सगा !
आग लगाने वाले राजनीतिज्ञ हैं, दे देते हैं दगा !
जो मुसलमान पड़ोसी के साथ हुआ, तेरे साथ भी होगा !
स्वर्ण मृग (हिंदू राष्ट्र) के चक्कर में, खा गये हो धोखा !
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