जाति, कुल का अभिमान (लघु कथा)

Share this story: WhatsApp X

तमीज से बात करो, हम उच्च कुल से है, शराब का घूँट भरते हुए विष्णु शर्मा अपने साथी से बोला ! रोज हम तुम्हारे साथ खाने-पीने के लिए उठते बैठते है पर इसका यह मतलब नहीं है की तुम हम से ऊंचे हो गए ?

पास से गुजरते हुए मनोज श्रीवास्तव ने यह बात सुनी तो वो हैरान परेशान हो गया ! उससे रुका नहीं गया और वह बोल पड़ा “इस में कौन सा बड़प्पन या प्राप्ति है ? ब्राह्मण कुल के ऊँचे नाम पर कब तक आप लोग अपनी तथाकथित अहंकार और आम हिंदू की श्रद्धा को भुनाते रहोगे ? आप को तो चाहिए था की आप अपने बड़ों के नक़्शे-क़दमों पर चलते, और वह तो अपना और लाखों का जीवन सँवार कर गए पर तुम तो अपने पुरुखो का नाम ही शराब में डुबो रहे हो ! प्रभु का प्यार हो तो नीची से नीची जात वाला भी प्रभु का प्यारा बन जाता है और अपनी जाति ऊँची कर लेता है !

जाति कुल का अभिमान उत्तम नहीं, अपने कर्मो से पहचाने जाना ही उत्तम मार्ग है ना की अपने पूर्वजों की कमाए पर ऐश करना ! बड़े से बड़ा खजाना भी समाप्त हो जाता है अगर सन्तान या कुल अपने उत्तम राह से भटक जाए ! अगर खुद भी कुछ कमाओगे तभी पुरुखो का खजाना बढ़ेगा !
याद रखना की कोई कितने ही उच्च कुल से क्यों ना हो परन्तु अगर उसमे प्रभु भगती नहीं है तो वह एक शव के समान है !

विष्णु शर्मा किकर्तव्यमूढ़ हो गया और बोला “भाई आज तुमने मेरी ऑंखें खोल दी है, मैं तो यही सोचता था की उच्च कुल में जन्म लेने मात्र से ही मेरा कल्याण हो जाना है ! आज तुमने अपने उत्तम और दैवीय विचारों से मुझे सही मार्ग समझा दिया और मैं वचन देता हूँ की आज से ही ये मलेच्छ कार्य बंद और प्रभु के सत्य का मार्ग आरंभ ! यह कहते हुए विष्णु शर्मा फूट फूट कर रोने लगा और उसने शराब की बोतल दूर फेंक दी !


Leave a Comment

Reader Comments