सरकार, तुमनें हमारा नमक खाया है ! (निक्की कहानी)

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सुना है की एक नयी राजनितिक पार्टी ने चुनाव के समय "आम जनता" से पैसा चंदे के रूप में माँगा है ? (महेश ने राकेश से पुछा)

राकेश : चलो अच्छा है कम से कम जनता के काम तो होंगे अब !

महेश (हैरान होते हुए) : मतलब ? क्या पहले जनता के काम नहीं होते थे ?

राकेश (हँसते हुए) : ऐसी बात नहीं है ! पर पहले जनता के फाएदे के काम कम ही होते थे और उनमें भी ओद्योगिक, शराब, रेत, पत्थर और बिल्डर इत्यादि लाबी द्वारा भांजी मार दी जाती थी, क्योंकि चुनाव में चंदा यही लोग ज्यादा देते थे ! अब जिसका नमक खाया जाएगा उसका हक़ तो अदा करना ही पड़ेगा ना ? इसलिए ज्यादातर उन्हीं को फायदा पहुँचाया जाता था !

महेश : तुम्हारा मतलब है की "प्रजातंत्र" होते हुए भी देश में अब तक केवल "पार्टीतंत्र" ही चल रहा था ? जैसे पहले राजा होते थे अब पार्टियाँ होती हैं, जो देश पर और देश के धन पर शासन करती हैं, और अपनी मर्ज़ी के हिसाब से उस धन को विलासता पर खर्च करते हैं ना की आम जनता की भलाई सोच कर ?

राकेश : जी हाँ ! अब क्योंकि पैसा आम जनता दे रही है तो जवाबदेही भी आम जनता ही करेगी की बताइए की "हमारे पैसो से बनी पार्टी या सरकार जी, देश के पैसों का हिसाब दीजिये" !

महेश (जोर से हँसते हुए) : तो इसका मतलब अब जनता गब्बर सिंघ हो गयी है जिसका नमक रुपी चंदा इस पार्टी रुपी कालिया ने खा लिया है ... तो डायलोग कुछ ऐसे होगा . "सरकार ! तुमनें हमारा नमक खाया है .. अब उस नमक का कर्ज चुकाओ !"

(दोनों जोर-जोर से हँसते हैं ! आस पास से गुजरते लोग हैरानी से उन्हें देखते हुए मुस्कुराते हुए निकल जाते हैं)

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