तेरी बहन .... ! (निक्की कहानी)

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बहुत बुरा हुआ उस लड़की के साथ.. कितनी दरिंदगी से बलात्कार किया गया ! (गाली देता है) देखो समाज में इस घटना के प्रति कितना रोष है ? मेरा तो अपना खून खौल रहा है.. मेरा वश चले तो मैं उनकी .......... (गाली निकालता है) [मनोज अपने मित्र सुभाष से बाते कर रहा था)

सुभाष : एक बात बता.. तुम रोज़ खुद बलात्कार करते रहो तो कोई बात नहीं ? पर दूसरा करे तो खून खौलता है ?

मनोज : मतलब ?

सुभाष : आ चल, तुझे अपनी बात का प्रेक्टिकल दिखाऊं ....

दिखाता है ... कि दो दोस्त आपस में बाते कर रहे है और बातों बातों में ही पंद्रह-बीस मां-बहिन की गालियाँ निकालते हैं !

दिखाता है ... कि एक पिता और पुत्र अपने घर के सदस्यों के सामने ही माँ-बहिन की गालियाँ निकाल रहें हैं !

दिखाता है ... दिखाता है.... दिखाता है ... कि सौ में से नब्बे लोग बिना गालियाँ निकाले बात ही पूरी नहीं करते !

सुभाष : क्या समझ आया ?

मनोज : कुछ कुछ समझ में आ रहा है ... बाकी तू समझा दे !

सुभाष : इन गालियों का मतलब अगर तुम कभी दो मिनट भी बैठ कर समझोगे तो तुम्हारे रोंगटे खड़े हो जायेंगे ! एक सगा भाई जब अपने ही भाई को माँ-बहिन की गाली निकालता है तो समझना उसने अपने घर में ही एक बलात्कार किया !

एक दोस्त जब दुसरे दोस्त को चाहे प्यार प्यार में ही माँ-बहिन की गाली निकालता है तो समझ लेना की उसने जाने-अनजाने अपने प्यारे मित्र की माँ-बहिन के साथ बलात्कार किया !

समाज खुद रोज़ ना जाने कितनी बार अपनी दोस्तों, दुश्मनों और अपने परिवार में ही ना जाने कितनी माताओं-बहनों के साथ बलात्कार करता है ? पर कोई भी आवाज़ नहीं उठाता ? क्यों ? क्यों ?

मनोज (सर झुका कर) : समाज के हर वर्ग में आज गाली निकालना एक राष्ट्रीय खेल बन चुका है और शायद समाज ने इसको इस दर्जे तकक कबूल कर लिया है कि अपने ही गहर में आज गाली निकालना बुरा नहीं समझा जा रहा ! समाज में गहिरी पैंठ बना चुकी इस महा-लानत ने गन्दगी के नाले बहा दिए हैं ! मैं शर्मिंदा हूँ ... मैं आगे से बहुत ही ध्यान रखूँगा की कम से कम मैं इस महा-लानत से छुटकारा पा सकूँ !

सुभाष : अच्छा और शरीफ शहरी बनना हम सबका फ़र्ज़ है, केवल सरकार को ही नहीं, केवल पुलिस को ही नहीं, केवल इसको... उसको नहीं बल्कि हम सबको अपने प्रतिबिब को देखने की जरूरत है !

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