भस्मासुर मीडिया ! (निक्की कहानी)

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क्या बात है ? आज इन भाई साहिब की भूख हड़ताल को 34 दिन होने को आये और किसी भी राष्ट्रीय मीडिया में इनके बारे में कोई भी खबर दिखाई नहीं दी ? (रमेश ने अपने मित्र सुखदीप सिंघ से पुछा)

सुखदीप सिंघ : भाई ! हमने तो हर जगह खबर दे दी है पर वो कहते है की ऊपर से हुकम नहीं है, इसलिए हम मजबूर हैं !

रमेश (हैरान होते हुए) : हैं ? आज़ाद देश के मीडिया का ऐसा बुरा हाल हो चुका है ? अभी किसी लीडर की ऊँगली में चोट भी आ जाए तो चार-घंटे घंटे ब्रेकिंग न्यूज़ के नाम पर ये चैनल चुप नहीं होते ! या बताओ की फिर लाखों कहाँ से लायें अपनी खबर खरीदने के लिए ?

सुखदीप सिंघ : आज मीडिया की हालत भी उस गांधारी जैसी हो चुकी है, जिसने अपनी आँखों पर जान-बूझ कर पट्टी बाँध रखी है ! भारत में अल्पसंख्यक समुदायों के मानवाधिकारों के उलंघन के मामलों पर मीडिया की चुप्पी उनके प्रजातंत्र के चौथे स्तम्भ होने पर संदेह प्रगट करती है !

रमेश (मन उदास कर के) : शायद तुम ठीक कहते हो ! इस मीडिया के चौथे स्तम्भ रुपी तोते में ही आम आदमी रुपी राक्षस की जान टिकी है और उस तोते की गर्दन राजनितिज्ञो के हाथ में है !

सुखदीप सिंघ : किवदंती के अनुसार भस्मासुर भी अपने ही हाथों से ही मारा गया था, देखना ऐसा समय आएगा जब यही मीडिया आम मानस में अपना विश्वास खो देगा और भस्मासुर की तरह जल जाएगा !

सुरेश : मुझे आप लोगों से हमदर्दी है पर शायद यह सब देखने के बाद मेरी यह हमदर्दी भी खोखली ही प्रतीत हो रही है ! (अल्पसंख्यकों के प्रति मीडिया का नकारात्मक रुख देख दुःख से रो पड़ता है)

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